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श्री नन्दकिशोर शारदासन् 1959 में मात्र 15 वर्ष के थे तब उनके पिताजी के आकस्मिक देहावसान ने उन्हें विचलित कर दिया और उन्हें इस भौतिक शरीर के नाश्वान होने का बोध हुआ। उसी समय उन्होंने यह दृढ़ संकल्प किया कि वे भौतिकवाद के आकर्षण व सुख सुविधाओं में लिप्त नहीं होंगे और इस भौतिक शरीर को इतने वर्षों तक चलायेमान रखने वाली चैतन्य शक्ति कीखोज करेंगे। वह शक्ति क्या हैं? कैसे इस शरीर को चलाएमान रखती है? मनुष्य ने जन्म किस उद्देश्य से लिया है? उसे जीवन कैसे बिताना चाहिये?

वे कई साधुओं, तांतिक मान्त्रिक, संत, महात्माओं के पास गये और उनसे प्रश्न पूछे व आध्यात्मिक, धार्मिक पुस्तकें पढ़ी पर उन्हें कहीं भी सन्तुष्टि नहीं मिली। एक बार वे किले की घाटी पर घूम रहे थे। उन्हें टेकरी पर एक मंदिर दिखाई दिया। वे वहाँ गये तो उन्हें एक अद्भुत शांति मिली। उन्होंने भौतिक शरीर की माँ भी जगतजननी माँ त्रिपुरसुन्दरी को बना लिया एवं उनकी एकनिष्ठ आराधना रात दिन व्याकुलता व विरह में की। माँ त्रिपुरसुन्दरी उनकी पुकार सुनकर अपने को रोक नहीं सकी, उन्हें साक्षात् दर्शन दिये तब भैया ने माँ के चरण पकड़े, माँ ने अपने लाडले बेटे को अपनी असीम शक्तियाँ प्रदान की। भैया व माँ एकमय हो गये।

भैया ने स्वयं अति कठिन तपस्या की लेकिन हमको सरल मार्ग बताया। यदि हम श्रद्धा, विश्वास, प्रेम, समर्पण से कियान्वित कर साधना करें तब ही भैया हमको महाशक्ति माँ से भी मिला सकते हैं।

उन्होंने जगत्जननी माँ को गुरू बनाकर सर्वोत्कृष्ट स्तर की दिव्य साधना की और जो अमृततुल्य दिव्य ज्ञान प्राप्त किया व उन्हें जो अनुभव हुए उनको विज्ञान से प्रारम्भ कर, विज्ञान की सीमाओं के परे ब्रह्माण्ड की संरचना, सृष्टि की उत्पति, प्रकृति, दिव्य लोक, ईश्वर की सत्ता, मानव जीवन लेने का लक्ष्य, चैतन्य शक्तिका महत्व आदि को समग्रता में दिव्य ग्रन्थ मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार में प्रस्तुत किया हैं जिसको पढ़कर मनुष्य का ईश्वर व चैतन्य शक्ति पर अटूट श्रद्धा-विश्वास बढ़ जाता है।

श्री शारदा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के बारे में माँ त्रिपुरसुन्दरी के लाडले चक्रधारी युगप्रवर्तक अध्यात्मयोगी श्री नन्दकिशोर शारदा (जीवन वृत) में सविस्तार विवरण दिया गया है। उसमें उनकी हस्तलिखित डायरी भी है, जिसमें उनका माँ के प्रति समर्पण, दार्शनिक विचार व गुरू माँ से जो ज्ञान प्राप्त किया व अनुभव हुए, वे सभी इसमें सम्मिलित हैं।

भैया श्री नन्दकिशोर शारदाने निष्काम कर्म के अन्तर्गत बालिकाओं की शिक्षा के लिए 1996 में स्थापित स्वामी विवेकानन्द स्टुडेन्ट्स वेलफेयर चेरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम से हजारों छात्राओं को शिक्षा एवं संस्कार प्रदान किये तथा उनके जीवन में आशा की किरण संचारित कर उनके उज्ज्वल भविष्य की राह प्रशस्त की ।

24 जनवरी 2003 को विवेकानंद जयंती पर वे चैतन्य स्वरुप हो गये। उन्होंने संसार में रहते हुए सभी सांसारिक विकारों से अछूते रह कर अनवरत् अथक, निष्काम कार्य करते हुए एक स्थितप्रज्ञ जीवन का उदाहरण प्रस्तुत किया। "मणिद्वीप का अध्यात्म पुरुष - श्री नन्दकिशोर शारदा उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर लिखा गया एक स्मृति ग्रंथ है जिसमें करीब 350 से अधिक जाने-माने सभी वर्ग के व्यक्तियों ने अपने अंतरंग विचार प्रकट करते हुए उन्हें श्रद्वांजली अर्पित की। (कई अलंकारों से सम्बोधित किया हैं)

अब उनके उच्च विचार, उनके आदर्श कर्म, उनके दिव्य ज्ञान की अनुभूतियाँ एवं उनके आध्यात्मिक अनुभव पल-पल जन-जन के मार्ग को प्रशस्त कर रहे हैं। आज सैकड़ो लोग उन्हें अपना आदर्श प्रेरक मानकर एवं उनके बताये गये सिद्धान्तों को अपने जीवन में उतारते हुए गृहस्थ जीवन के साथ साथ अध्यात्म जगत् में भी उन्नति कर रहे हैं। यह सब इसलिये संभव हुआ क्यों कि 'जगत्जननी माँ त्रिपुरसुन्दरी का उन पर वरद् हस्त एवं कृपा थी।

साथ ही उनके सत्कार्यों से जन-जन को भी प्रेरणा मिले इसलिये प्रशासन द्वारा उनके सम्मान स्वरुप उनकी याद को चिरस्मरणीय रखने के लिये उनके नाम पर 2012 में जोधपुर में 'श्री नन्दकिशोर शारदा मार्ग', पाँचवी रोड से बारहवी रोड तक, 2013 में बालोतरा (बाड़मेर) में 'अध्यात्मयोगी श्री नन्दकिशोर शारदा मार्ग व 2022 में बाड़मेर जिले के जसोल कस्बे में'युगप्रवर्तक श्री नन्दकिशोर शारदा' रखा गया है।

श्री नन्दकिशोरजी शारदा अपनी सच्ची लगन, वैराग्य, एकाग्रता, दृढ़संकल्प व जुनून द्वारा सभी चारों कठिन साधनाओं - भक्ति योग, ज्ञान योग, निष्काम कर्मयोग एवं योग साधना में निष्णात हुये। उन्होंने विचार किया कि ये समस्त साधनायें अत्यन्त कठिन है व आज के युग में एक सामान्य व्यक्ति के लिए असंभव सी ही हैं। अतः जनकल्याण हेतु इन चारों साधनाओं का सरलीकरण कर, और आवश्यकतानुसार समावेश कर, एक नयी सरत सामयिक साधना व सच्चे आनन्द, शान्ति, खुशी को प्राप्त करने की पद्धति को प्रतिपादित किया जिसका नाम 'बुद्धि-विवेक योग साधना है।

भैयाजी का योगदान अपने आप में असाधारण और इस युग में बेमिसाल है। उन्होंने आज के युग के अनुरूप भौतिक, सामाजिक व आध्यात्मिक सभी क्षेत्रों की आवश्यकतानुसार नई विचारधारा, नई पद्धति, नया ज्ञान इत्यादि दिया जिसके फलस्वरूप ऐसे लोगों की टीम तैयार हो रही है जो मानवीय गुणों को पुनः स्थापित करने के लिए कटिबद्ध और समर्पित है। उन्होंने इस युग में नई चेतना का सूत्रपात कर उसे जागृत किया और वसुधैव कुटुंबकम्, विश्व शांति की भावना को जीवन प्रदान किया। मानव जाति को अंधकार से प्रकाश की ओर ले गए, वे सदैव जन आकांक्षाओं व अपेक्षाओं पर खरे उतरे। धरती माँ धन्य हुई ऐसे लाड़ले को पाकर।