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माँ बसन्ती मनिहार का जन्म 28 सितंबर 1942 को जोधपुर के एक अत्यंत सम्माननीय, संभ्रान्त, सम्पन्न, सुसंस्कृत एवं सुशिक्षित परिवार में हुआ। वे एडवोकेट श्री सोहनलाल मनिहार (कबूतरों का चौक) की सुपौत्री एवं एडवोकेट श्री हरकलाल जी मनिहार एवं श्रीमति सिरेकंवर की सुपुत्री हैं। उन्होंने डण्। ण्ए ठण्म्कण् तक की शिक्षा प्राप्त की। वे बचपन से ही सरल, सात्विक व परोपकारी विचारों की थी। भैया श्री नन्दकिशोर शारदा उनके बुआ के लड़के थे।

उनके पिता ने उनकी व उनके मार्गर्शक अध्यात्मयोगी श्री नन्दकिशोर शारदा की कई कठिन आध्यात्मिक परीक्षायें लेकर उन्हें अध्यात्म में जाने की आज्ञा दी। श्री शारदाजी के पथ-प्रदर्शन में सन् 1964 से समस्त सुख-सुविधायें त्याग कर जगत्जननी माँ की बच्ची बनकर अलौकिक साधना की और भैयाजी से दिव्य शाश्वत् ज्ञान प्राप्त किया। भैया ने उन्हें शक्तियाँ देकर तराशा और जगत्जननी माँ के प्रेम व वात्सल्य में सरोबार कर उन्हें 'माँ' का आशीर्वाद दिलवाया व सम्पर्क कराया। माँ बसन्ती के अन्दर भैया ने अध्यात्म को आत्मसात् करा दियज्ञं उनके बारे में भैया की डायरी से-

बसन्ती-माँ की लाडली
Daughter of Parwardigar
मेरे इससे कई सम्बन्ध है। सबसे पहले मैं इसका पथ प्रदर्शक हूँ। माँ इसकी माँ वात्सल्यमयी माँ व गुरु है। दूसरा यह वह लड़की है जिसने दुनिया मैं सच्चे प्रेम की मिसाल कायम की है। व यह मुझे अपने लाडले बेटे की तरह ळनपकमत की तरह सच्चे दिल से प्रेम करती है। यह दिन रात माँ माँ जपती रहती है। व माँ वात्सल्यमयी माँ की प्रेम साधना में लीन रहती है। इसकी कोशिश हैं 24 घन्टों में से 12 घन्टे कम से कम माँ का नाम आसन पर बेठकर लिया जाय। इसका मेरी राय में माँ व अपने प्रेम के लिये त्याग अनुपम व अनुकरणीय है। आजीवन ब्रह्मचारीणी व अभी तक जीवन जीवन निर्मल यह कोई बहुत बड़ी शक्ति है। इसे मैं माँ की तरह समझता हूँ व इसके व हमारे मध्य भाई बहन का रिश्ता भी हैं।

किशोर- माँ का लाडला

काफी लंबे समय तक श्री नन्दकिशोर जी शारदा एवं माँ बसन्ती जी ने मनिहारों की हवेली (वर्तमान में सिद्धपीठ) कबूतरों के चौक में एकनिष्ठ होकर साधना की व चरमावस्था को प्राप्त किया। सन 1995 बसन्त पंचमी के शुभ दिन माँ त्रिपुरसुंदरी की आज्ञा से मणिद्वीप का निर्माण पूरा हुआ और माँ परिवार मणिद्वीप में 10 जून 1995 को स्थानांतरित हो गया। यहाँ पर भी दोनों की दिव्य साधना अनवरत जारी रही।

श्री नन्दकिशोर शारदा सन 2003 में चैतन्य स्वरूप हो गये। परन्तु माँ बसन्ती की प्रार्थना के कारण वे आज भी चैतन्य स्वरूप से मणिद्वीप में विद्यमान हैं। भैया जी के चैतन्य स्वरूप होने पर माँ बसन्ती ने अपना सारा अस्तित्व अपने मार्गदर्शक के चरणों में समर्पित कर दिया। उन्होंने दो संकल्प किए, पहला तो जन कल्याण के लिए भैया जी के ज्ञान को सरल बना कर प्रचार प्रसार का संकल्प जिसे उन्होंने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जीवन पर्यंत निभाया और दूसरा संकल्प कि जब तक होश में हूँ सदैव सत्कर्म करती रहूंगी और जिसे उन्होंने अंत तक निभाया।

भैयाजी के दिव्य ज्ञान को आमजन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने सर्वप्रथम भैयाजी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर, जोधपुर के लगभग 300 गणमान्य व्यक्तियों के संस्मरणों से परिपूर्ण स्मृतिग्रंथ मणिद्वीप का अध्यात्म पुरुष- श्री नन्दकिशोर शारदा का प्रकाशन करवाया जो कि भैयाजी के दिव्य जीवन दर्शन, उनकी शिक्षा के प्रचार-प्रसार में योगदान तथा अध्यात्म दर्शन को उजागर करता है। इससे लोगों को प्रेरणा मिली व उनकी अध्यात्म के प्रति जागरूकता बढ़ी।

तत्पश्चात् "माँ" प्रदत्त दिव्य ज्ञान का जिसे भैयाजी ने लिपिबद्ध करवा दिया था उसको "मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार (हिंदी व अंग्रेजी भाषा) पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाया। इस पुस्तक से पाठकों को चैतन्य जगत के बारे में जानकारी मिली, अध्यात्म के क्षेत्र में उनके शक संदेह दूर हुए व ईश्वर के प्रति श्रद्धा-विश्वास बढ़ा।

उन्होंने माँ त्रिपुरसुन्दरी के लाडले चक्रधारी युगप्रवर्तक अध्यात्मयोगी श्री नन्दकिशोर शारदा पुस्तक का प्रकाशन व वितरण करवाया जिसमें भैयाजी के भक्तिमय, ज्ञानमय, मानव सेवामय जीवन वृत्त का विवरण है जो उनकी साधना पद्धति एवं उनके आत्मज्ञान को दर्शाती है।

सन् 1964 से उन्होंने युगप्रवर्तक भैया जी के मार्गदर्शन में अध्यात्म रास्ता ग्रहण कर जो जगतजननी माँ की असीम कृपा एवं परमानन्द का स्वाद चखा। उसी परमानन्द को, निःस्वार्थ, सभी व्यक्तियों में बांटकर, मानव मात्र की जिज्ञासाओं को संतुष्ट कर सभी का कल्याण किया। अतः भैया जी के सर्वोत्कृष्ट दिव्य ज्ञान का सरलीकरण कर उन्होंने सन् 2007 से मणिद्वीप में प्रत्येक रविवार को सुबह छात्र-छात्राओं के सर्वांगीण विकास के लिए संस्कार कक्षाओं का एवं शाम को आध्यात्मिक ज्ञान चर्चाओं का आयोजन किया।

रविवार प्रातः कालीन कक्षाओं द्वारा छात्र-छात्राओं में सुसंस्कार एवं उनके व्यक्तित्व का विकास किया। उन्होंने सभी छात्राओं का आत्मविश्वास बढ़ाया, ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास पैदा किया, शिक्षा के प्रति रुचि पैदा की, शिक्षा के महत्व को बताया। फलस्वरुप छात्राओं में सकारात्मक सोच उत्पन्न होने लगी और उनमें सद्‌गुणों का विकास होने लगा। शिक्षा के क्षेत्र में जनक्रांति सी हो गई और शिक्षित, संस्कारित छात्राएं अच्छी नागरिक बनने लगीं।

रविवारिय ज्ञान चर्चाओं से धन्य हुए हैं हम सभी कि आज भी उनकी आत्मीयता एवं वात्सल्य की शीतल छांव से ओतप्रोत हो रहे हैं। विचारों का परिवर्तन एवं सकारात्मक दृष्टिकोण कोण के द्वारा अध्यात्म पथ की ओर अग्रसर होते हुए, तनाव मुक्त होकर आनन्द, शांति, सुख, समृद्धि का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। माँ बसन्ती जी के संरक्षण में मणिद्वीप आध्यात्मिक ज्ञान और जीवन चैतन्यता का केन्द्र बन गया।

एक बार अपने साधना कक्ष में गहन साधना के क्षणों में जगतजननी माँ का आदेश मिला कि उस स्थान को तुम खरीद लो। काफी चिंतन के बाद उन शब्दों का स्पष्टीकरण हुआ कि जगतजननी माँ अपने लाडले बेटे की साधना-स्थली को स्वयं रखना चाहती हैं अर्थात् वह पवित्र स्थल जिसे उनके पथप्रदर्शक भैया नन्दकिशोर शारदा ने अपनी कठिन आध्यात्मिक साधना से जाग्रत किया। उस स्थान को उन्हें अपने चाचाजी से खरीदना है, प्रक्रिया बहुत कठिन व असंभव थी, लेकिन "माँ" की आज्ञा को शिरोधार्य कर, उन्होंने कुछ पैसे का इंतजाम किया और बाकी पैसों का "माँ" ने। बड़े ही चमत्कारिक ग से उस स्थान को अध्यात्मयोगी श्री नन्दकिशोर शारदा साधना-स्थली सिद्धपीठ में परिवर्तित करवाया। आज वह तपोभूमि संपूर्ण चैतन्य व एक दर्शनीय स्थान है।

भैयाजी प्रदत्त बुद्धि-विवेक आधारित साधनापद्धति एवं ज्ञान द्वारा वे चैतन्यता व भौतिकता का समन्वय कर, मानव जीवन के उद्देश्य को समझाते हुए जिज्ञासुओं की कठिन समस्याओं का समाधान बहुत ही शीघ्र कर उन्हें संतोष प्रदान कर देतीं जिससे वे भौतिक संसार में रहकर भी उत्साह, उमंग व समृद्धि प्राप्त कर आनन्दमय जीवन जी रहे हैं। उन्होंने सभी जिज्ञासुओं के पारिवारिक जीवन को आनंदमय बनाया जिसके अभाव में आध्यात्मिक यात्रा प्रारंभ नहीं हो सकती। पारिवारिक जीवन में बुद्धि-विवेक योग साधना द्वारा विचारों में सकारात्मक परिवर्तन करके देखने का दृष्टिकोण बदलकर अध्यात्म की नींव डाली और वे आज भी चैतन्य स्वरूप से साधकों का मार्गदर्शन कर रही हैं।

माँ बसन्ती के जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को "मणिद्वीप की एक दीपशिखा जीजी बसन्ती मनिहार (लेखक प्रो. रामप्रसाद दाधीच) नामक पुस्तक में काव्य रूप में दर्शाया गया है।

7 मई 2021 को वे भी चैतन्य स्वरूप हो गईं लेकिन वे आज भी भैयाजी व जगत्जननी माँ के साथ मणिद्वीप में विराजमान है एवं उसका संचालन कर रहे हैं एवं साधकों का अध्यात्म के क्षेत्र में मार्गदर्शन कर रही हैं। वास्तव में जगत्जननी माँ त्रिपुरसुन्दरी, भैया नन्दकिशोर शारदा एवं माँ बसन्ती एक ही है। यही शाश्वत सत्य है।