उन्नीस वर्षीय एक अल्हड़ सी लड़की अपने छोटे-छोटे सुखों में सुखी एवं छोटे-छोटे दुःखों में दुःखी होती हुई अपना जीवन निर्वाह कर रही थी कि अचानक ही माँ बसन्ती जी ने मुस्कुराकर "माँ सरस्वती" के रुप में अपना वरदहस्त उन पर रख दिया और उनका आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त कर दिया। माँ बसन्ती जी से उनकी प्रथम मुलाकात अचानक अस्पताल में हुई। वहीं से वे उनके सात्विक विचार एवं माँ के प्रति निष्कपट बालिकावत् व्यवहार देखकर उनसे अत्यंत प्रभावित हुई और माँ परिवार की हो कर ही रह गयी।
सन् 1970 में सुश्री मधुबाला जी अडवानी (मधु मों) का माँ परिवार में आगमन हुआ। 19 वर्षीय, बी.एस.सी. की छात्रा, उनकी मुलाकात माँ बसन्ती जी से अस्पताल में हुई। पहली ही नजर में माँ बसन्ती जी को दिव्य दृष्टि से महसूस हो गया कि वो उनके साथ की है और सुश्री मधुबाला जी अडवानी भी माँ बसन्ती जी के सात्विक विचार एवं जगत्जननी माँ के प्रति उनका निष्कपट, बालिकावत् व्यवहार से इतनी प्रभावित हुई कि अन्ततः माँ परिवार की ही हो कर रह गयीं। आगे चलकर भैयाजी उनके भी पथप्रदर्शक बनें। सुश्री मधुबाला जी अडवानी पिछले 50 वर्षों से माँ बसन्ती जी एवं भैयाश्री नन्दकिशोर जी शारदा के मार्गदर्शन में साधनारत है।
माँ बसन्ती जी के चैतन्य स्वरूप हो जाने पर अब भैयाजी व माँ बसन्ती जी के सभी कार्य को भौतिक स्तर पर सुश्री मधुबाला जी अडवानी सुचारु रुप से सम्भाल रही हैं और उसे आगे बढ़ा रहीं हैं।