भैया श्री नन्दकिशोर शारदा ने जगत्जननी माँ को गुरु बना कर उनसे जो दिव्य ज्ञान प्राप्त किया उसे मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार नामक दिव्य ग्रंथ में लिपिबद्ध करवाया। इसमें ब्रह्माण्ड के निर्माण के रहस्य, दिव्य लोकों के निर्माण, ब्रह्म कणों (जो चैतन्य लोक की मूलभूत इकाई है. और अजर, अमर, अविनाशी हैं) के मूल गुण-धर्म, भौतिक एवं चैतन्य दो शरीरों की अवधारणा, देवी देवताओं के लोक, देवदूतों का होना इत्यादि, चैतन्य जगत के अनेक रहस्यों को उजागर किया गया है। शारदा जी की यह दिव्य कृति मानवता के लिए अमृतुल्य अलौकिक देन है। जिन लोगों में दिव्य ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा है, (ब्रह्माण्ड के रहस्य) उनके लिए यह एक मौलिक, सदर्भ ग्रंथ है। इस पुस्तक को पढ़कर कई नास्तिक लोग आस्तिक हो गए।
मृत्यु के बाद क्या? यह एक ऐसा अनादिकाल से चला आ रहा अनुत्तरित प्रश्न है, जिसका हल पाने के लिये हमारे भारतीय ऋषि प्रतिभाओं, साधु, संतों, वैज्ञानिकों एवं आध्यात्मिक चिन्तकों द्वारा निरन्तर प्रयास किया जाता रहा है। प्राचीन काल के आदि वेदों से लेकर कठोपनिषद तक तथा सभी धर्मों में हमारे पूर्वजों ने परब्रह्म परमात्मा के अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने के लिये अध्यात्म पर गहन चिंतन किया है। भारत आज कितनी भी औद्योगिक तरक्की तथा विज्ञान का विकास कर ले. प्रत्येक भारतीय में दर्शन एवं अध्यात्म के प्रति रुचि संस्कारजन्य है। संसार की सभी भौतिक उपलब्धियाँ प्राप्त करके भी जब वह एकाकी होता है तब पहला प्रश्न यही उसके मन में उदय होता है कि क्या इस क्षणभंगुर जीवन में कहीं स्थायित्व नहीं है ? क्या जीवन का अंतिम सत्य मौत ही है ? भैया नन्दकिशोर शारदा जी ने इसी चिन्तन क्रम को आगे बढ़ाते हुए क्षितिज के उस पार कुछ खोजने का प्रयास किया है, जिसकी परिणिति के रूप में यह पुस्तक मृत्यु के बाद का अलौकिक संसार पाठकों के हाथ में है।
विज्ञान एवं अध्यात्म पर कई पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। इनमें लेखक या तो वैज्ञानिक थे अथवा दार्शनिक शारदा जी पहले लेखक हैं जिनकी सोच विज्ञान आधारित थी एवं स्वयं एक उच्चतम कोटि के दार्शनिक, जिन्होंने "माँ की कृपा से दिव्य लोकों का स्वानुभव किया। भैया जी वास्तव में असाधारण प्रतिभा के धनी थे।
परमपिता परमात्मा की आज्ञा मिलने पर भले ही मई 2002 से प्रस्तुत कृति का लेखन एवं लिप्यांकन प्रारम्भ हुआ किन्तु इस विषय पर भैया का चिन्तन मनन अध्ययन वर्षों पूर्व से चल रहा था। जब भी वे मानसिक अवकाश में होते, इस विषय की चर्चा करने लगते। यह विषय जैसे उनकी आध्यात्मिक साधना का केन्द्रीय विषय था ।
इस पुस्तक के प्रथम अध्याय में आदि काल से चले आ रहे हमारे पूर्वजों, संतों एवं अध्यात्म प्रवर्तकों ने जो मृत्यु पर चिंतन किया है और आज विज्ञान मृत्यु के बारे में अपना क्या सिद्धान्त देता है ? उस पर भैया ने गहन चिंतन कर जो निष्कर्ष निकाला, उसे बताते हुए यह प्रश्न उठाया है कि जब पृथ्वी पर हर प्राणी आनुवंशिकता के नियमों के अन्तर्गत जन्मते ही अपने सभी कार्य कलाप करने में स्वयं ही सक्षम होता है तो मानव के बच्चे में ही ऐसा क्या हो जाता है कि वह जन्म के समय अपने सभी क्रियाकलापों में शून्य होता है और उसे अपने जीवन की मूलभूत दैनिक क्रियाओं का पालन करने के लिये भी अपने माता पिता पर निर्भर रहना पड़ता है, लेकिन जब वही बालक बड़ा हो जाता है तो अनन्त शक्तियों का मालिक बन विवेकानन्द जैसा महान ज्ञानी, आइन्स्टाइन जैसा महान वैज्ञानिक, तो कभी कभी इससे बिल्कुल ही विपरीत एक विध्वंसकारीडाकू या साधारण सा गुमनाम व्यक्ति ही बनकर रह जाता है।
द्वितीय अध्याय में विज्ञान के वे मूलभूत सिद्धान्त, जिन पर भैया ने अध्यात्म की आधारशिला रखी है, उन्हें सामान्य पाठक को उन्हीं के स्तर पर समझाते हुए सृष्टि में दिव्य लोकों के सम्भावित स्थान कहा पर हो सकते हैं, इस विषय पर चर्चा की है।
तृतीय अध्याय में भौतिक जगत के मूल कणों एवं चैतन्य जगत के मूल कणों के गुण धर्म एवं उनमें जो स्वाभाविक अन्तर है, उन्हें समझाते हुए परब्रह्म परमात्मा को विज्ञान के आधार पर प्रतिपादित करने का प्रयास किया है।
चतुर्थ अध्याय में प्रकाश के विशेष गुणों के आधार पर प्रकृति की जादुई लीला समझाते हुए यह रहस्य सुलझाने का प्रयास किया है कि प्रकाश द्वारा जो वस्तु हमें जहाँ दिखाई दे रही है वास्तव में वहाँ नहीं है, अपितु हम उसका आभासित प्रतिबिम्ब मात्र ही वहाँ देख रहे हैं तथा इसी अध्याय में स्वामी विवेकानन्द को माँ काली के दर्शन साक्षात् किस तरह सम्भव हो सकते हैं, इस रहस्य को भैया ने विज्ञान के आधार पर सुलझाने का प्रयत्न किया है।
पंचम अध्याय में मृत्यु के बाद जब मनुष्य पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल से विलग हो जाता है तब उसकी क्या स्थिति होती है ? वह पृथ्वी पर क्या छोड़ जाता है तथा ऐसी स्थिति में उसका क्या स्वरूप होता है? इस पर चिन्तन किया गया है।
हमारे विज्ञान की अंतिम सीमा प्लांक काल के पूर्व क्या था? इस रहस्य को सुलझाते हुए दिव्य लोकों के निर्माण की प्रक्रिया तथा दैविक चैतन्य शरीरों के निर्माण के रहस्य को सुलझाने का षष्ठ अध्याय में प्रयास किया गया है।
सातवें अध्याय में इसी ज्ञान के आधार पर पाठकों में जो सम्भावित प्रश्न उदय हो सकते हैं, उनका निराकरण करने का प्रयास किया है।
पुस्तक के मूल सूत्रधार अब कीर्तिशेष हो गये। "अगर यह दैवीयदत्त ज्ञान पृथ्वी पर आ गया तो चारों तरफ 'आनन्द ही आनन्द हो जायेगा।" यही उनके अंतिम शब्द थे। आनन्द ही आनन्द का उद्घोष करते हुए वे दैव पुरुष 24 जनवरी 2003 विवेकानन्द जयन्ती (माघ कृष्ण पक्ष सप्तमी) पर ब्रह्मलीन हो गए। यह पुस्तक उनकी कीर्ति का स्मारक है। उनकी योजना "ज्ञान गंगा मिशन की स्थापना कर उसके अंतर्गत इस पुस्तक का प्रकाशन कर जन जन तक पहुँचाने की थी। उन्हीं की योजनानुसार अब हमने "श्री नन्दकिशोर शारदा ज्ञान गंगा मिशन' की स्थापना की है और उसी के तत्वावधान में यह पुस्तक प्रकाशित करवा कर जन जन तक पहुँचाने का प्रयत्न कर रहे हैं। उनकी हार्दिक इच्छा की सम्पूर्ण पूर्ति का यह एक अंकिचन प्रयास है।