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मणिद्वीप का प्रतीक चिन्ह

भैया श्री नन्दकिशोर शारदा ने अपने जीवन काल में ही मणिद्वीप के प्रतीक चिन्ह सवहबद्ध की अवधारणा को तैयार कर लिया था, जिसे मूर्तरुप माँ बसन्ती मनिहार ने दिया। बुद्धि-विवेक योग साधना एक साधन है, रास्ता है जबकि मणिद्वीप का प्रतीक चिन्ह साधना से संबधित मूल ज्ञान व उद्देश्य है।

इसकी भव्यता और प्रभाव का अनुभव तभी होगा जब व्यक्ति इसकी साधना में अग्रसर हो। इसका जो क्रम दिखाया गया है वह आकस्मिक नहीं है बल्कि मार्गदर्शक के स्वअनुभव एवं गहन चिंतन पर आधारित है। यह अपेक्षा की जाती है कि साधक इसी क्रम का निष्ठापूर्वक पालन करें।

इसके मूल सोपान इस प्रकार हैं।

जिज्ञासा

हर व्यक्ति जीवन के प्रत्येक क्षेत्र (भौतिक या अध्यात्म) में उन्नति की इच्छा रखता है। इसलिये जब वह किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहता है तो उसमें जिज्ञासा होना अतिआवश्यक है। बिना जिज्ञासा के व्यक्ति न तो बौद्धिक जगत में उन्नति कर सकता है और न ही आध्यात्मिक जगत में। प्रबल जिज्ञासा से ही लक्ष्य को पाने का दृढ़ निश्चय और जुनून पैदा होता है। मणिद्वीप में साधक की अध्यात्म के प्रति जिज्ञासा तर्क एवं बुद्धि के आधार पर उत्पन्न की जाती है। जिस व्यक्ति में अध्यात्म के प्रति कोई जिज्ञासा नहीं हो तो भी उसमें अध्यात्म के प्रति जिज्ञासा यहाँ पैदा की जाती है।

ज्ञान

आध्यात्मिक क्षेत्र में ज्ञान प्राप्ति से जिज्ञासा की संतुष्टि होती है। ज्ञान वह शक्ति है जो व्यक्ति को लक्ष्य की तरफ आत्मविश्वास के साथ बढ़ने को प्रेरित करती है। सच्चे ज्ञान के अभाव में मनुष्य भटक कर पथभ्रमित हो सकता है। ज्ञान एक अथाह सागर है। किसी व्यक्ति के लिये यह पता लगाना कि कौनसा ज्ञान उसके लक्ष्य प्राप्ति के लिये उपयोगी है अति कठिन है। हर व्यक्ति के लिये ज्ञान की सीमा अलग अलग हो सकती है। बुद्धि-विवेक योग साधना पद्धति द्वारा उसके आध्यात्मिक स्तर के अनुरूप उसका पथ प्रदर्शन किया जाता है। इसीलिये एक आत्मज्ञानी गुरु अथवा मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है। प्रभावी और सच्चा मार्गदर्शक वह है जो स्वयं इस रास्ते पर चला हो और स्वअनुभव किया हो व दूसरों की भी चैतन्यष्यक्ति एवं उर्जा को जगा सके। मणिद्वीप वह स्थान है जहाँ मार्गदर्शकों ने भैया एवं माँ बसन्ती जी के संरक्षण एवं मार्गदर्शन में अध्यात्म को स्वानुभूत किया है।

सत्कर्म

अर्थात जो शाश्वत सत्य व स्थिर हो, जो कभी भी नहीं बदले और आनन्द, शांति, प्रेम व उल्लास प्रदान करे। सत्कर्म वे सारे कार्य करना जिससे आपकी अध्यात्म उन्नति हो जैसे ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा व विश्वास रखते हुए निःस्वार्थ भाव से उनसे जुड़ना, उनके गुणगान करना। सत्कर्म में दान देना, किसी के भविष्य निर्माण में योगदान देना आदि होते हैं। सत्कर्म ऐसा कि जिसके प्रति किया जाए उसके जीवन का निर्माण हो और उसके हृदय से दुआ निकले। सत्कर्म सिर्फ पैसे से नहीं, किसी को सही सलाह देकर या किसी बीमार की तीमारदारी करके भी किया जा सकता है। सत्कर्म द्वारा सदगुणों का विकास होता है। भौतिक व आध्यात्मिक दोनों जीवन में सत्कर्म राह के कांटों को हटाता है। और सही मार्ग प्रशस्त करता है।

मणिद्वीप में इन माध्यमों से सत्कर्म किया जा सकता हैं- जगत्जननी माँ प्रदत्त सत्य, शाश्वत् सरल, सार्वभौमिक, व्यवहारिक ज्ञान द्वारा जन साधारण को अध्यात्म (ईश्वर से जोड़ना) एवं सतमार्ग की ओर अग्रसर करना, नारी सशक्तिरकरण के अन्तर्गत बालिकाओं को शिक्षा एवं संस्कार प्रदान करना, छात्राओं को पाई एवं जीवन निर्माण के लिये मार्गदर्शन एवं सहयोग प्रदान करना, कोरोना द्वारा उत्पन्न विपत्तिजनक परिस्थितियों के निराकरण हेतु ज़रुरतमंद परिवारों में खाद्यान की आपूर्ति करना, इत्यादि ।

आराधना

जिज्ञासा, ज्ञान और सत्कर्म से परिपूर्ण व्यक्ति आराधना के लिये सुपात्र हो जाता है। उसका मन निर्मल और चित्त शांत हो जाता है। और मार्गदर्शक के निर्देशानुसार उसे धीरे धीरे दिव्य चेतना का आभास होने लगता है। व्यक्ति ईश्वर व सद्गुरु से जुड़कर उनका का गुणगान करने लगता है अर्थात "ईश्वर का निःस्वार्थ प्रेम एवं स्मरण ही मानव जीवन का आधर है इस ओर अग्रसर होने लगता है। साथ ही उनके गुणों को अपनाता है और दूसरों के व्यक्तित्व एवं चरित्र निर्माण में सहयोग प्रदान करता है।

साधक की साधना को प्रखर करने के लिये उपयुक्त स्थान श्री नन्दकिशोर शारदा साधना स्थली, सिद्धपीठ, मनिहोरों की हवेली, जोधपुर है जहाँ साधना (ध्यान, जप इत्यादि) करके साधक भौतिक एवं अध्यात्म दोनों जीवन में आनन्द शान्ति खुशी प्राप्त कर सकता है।

कल्याण

कल्याण लक्ष्य की चरम परिणिति है। जब साधक ईश्वर से पूर्ण रुप से जुड़कर उनका कृपा पात्र बन जाता है तो वह अपने आभामण्डल से दूसरे लोगों में भी सकारात्मक सोच का प्रादुर्भाव करता है और लोगों को सही राह पर चलने की प्रेरणा देता है। इस प्रकार मानव जीवन में नयी चेतना और नये युग का प्रारम्भ होता है।

हमारी पहचान

प्रतीक चिन्ह अर्थात पहचान, मणिद्वीप की पहचान - विश्व बन्धुत्व, विश्व शांति व मानव कल्याण हेतु प्रयासरत अध्यात्म समर्पित परिवार। इस प्रतीक चिन्ह की विशेषता है कि यह किसी धर्म विशेष से सम्बंधित नहीं है। कोई भी इसे अपनाकर अपना कल्याण कर सकता है।
अध्यात्म समर्पित परिवार चूंकि जगत्जननी माँ को मानता है, इसलिए प्रतीक चिन्ह केमध्य में माँ है। इस स्थान पर जो भी व्यक्ति जिस धर्म को मानते हो, उस धर्म के प्रवर्तक को प्रतीक चिन्ह के मध्य में रखकर इन सोपानों द्वारा स्वयं का कल्याण कर सकता है।
यह परिवार न सिर्फ राष्ट्र का कल्याण अपितु समस्त विश्व में आनन्द, शान्ति, खुशी फैलाने में प्रयासरत है। इस परिवार का लक्ष्य है कि पूरे विश्व में बंधुत्व की भावना से आपस में तारतम्य बने और शान्ति आये विश्व में शांति आएगी तो मानव मन में शांति आएगी। मानव मन में शांति तब आएगी जब वह इस अध्यात्म ज्ञान को धारण करेगा।

यह परिवार इस दिशा में प्रयासरत है क्योंकि यह एक सतत प्रक्रिया है। मणिदीप एक ऐसा परिवार है जो आपसी प्रेम से बना हुआ है, जिसका आधार ही विशुद्ध प्रेम है।
व्यक्ति मणिद्वीप के प्रतीकचिन्ह को अपने जीवन का उद्देश्य बनाकर अपने मानव जीवन लेने के उद्देश्य को पूर्ण कर सकता है।

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