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बुद्धि विवेक योग साधना पद्धति

मानव कल्याण हेतु भैया श्री नन्दकिशोर शारदा ने अपने अनुभवों के आधार पर भौतिक व चैतन्य दोनों प्रकार के जीवन को उन्नत करने के लिए एक सरल सामयिक साधना पद्धति को प्रतिपादित किया है जिसे बुद्धि-विवेक योग साधना पद्धति कहा जाता है।
भैयाजी नन्दकिशोर शारदा के अनुसारमनुष्य जीवन अमूल्य है, अनमोल है । मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है और उसमें ईश्वर का अंश है। अपनी इस कृति को ईश्वर ने बुद्धि और विवेक के रूप में दो अति बहुमूल्य उपहार दिये हैं जो मनुष्य को दूसरे प्राणियों से भिन्न एवं विशिष्ट बनाते हैं। वास्तव में बुद्धि की क्षमता अनन्त है और बुद्धि का अधिकतम सदुपयोग कर मनुष्य चरम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। लेकिन मानव जाति का यह दुर्भाग्य है कि इतनी बहुमूल्य वस्तु का नगण्य प्रतिषत ही उपयोग में ला रहा है। बुद्धि-विवेक आधारित साधना पद्धति में बुद्धि और विवेक को तराशना, परिष्कृत व निर्मल करने के लिए कई प्रकार के सोपान हैं जिनमें दक्षता हासिल होने पर बुद्धि निर्मल होने लगती है और विवेक जागृत होता है, विचारों में परिवर्तन होता है और देखने का दृष्टिकोण सकारात्मक हो जाता है।

"बुद्धि-विवेक योग साधना पद्धति अपने आप में अनूठी हैं। इस साधना में भौतिक शरीर, सामाजिक दायित्व, जीविका अर्जन परिवार के प्रति अपने कर्तव्य इत्यादि को विशेष महत्व है। भौतिक शरीर आवश्यक है क्यों कि इसके बिना कोई आध्यात्मिक साधना संभव नहीं है। वास्तव में स्वस्थ शरीर के महत्व को इस पद्धति में स्वीकारा गया है।
बुद्धि-विवेक योग साधना पद्धति में यदि कोई अवगुणों से भरा व्यक्ति भी आता है तो सर्वप्रथम उस पर छाये आवरणों को हटाकर बुद्धि-विवेक को निर्मल किया जाता है। फलस्वरूप वह व्यक्ति साधना के लिये सुपात्र बन जाता है और उसे अल्प समय में ही आशातीत सफलता मिलती है। इस दृष्टि से बुद्धि-विवेक योग साधना पद्धति अपने आप में बेमिसाल है।

इस पद्धति की विशेषताएं

  • हम स्वयं जागृत होते हैं, ऊर्जा षक्ति मिलती हैं, ज्ञान चक्षु खुल जाते हैं एवं उद्देष्यपूर्ण सुखी जीवन जीने लगते हैं, भौतिकता व अध्यात्म में सामंजस्य हो जाता है, वाणि, इंद्रियों एवं कामनाओं का सयंम करना सिखते हैं।
  • इस पद्धति को अपनाने से व्यक्ति में अन्तर्द्वन्द समाप्त हो जाता है क्यों कि वह स्वयं चिंतन एवं तर्क के आधार पर संकल्प कर अपनी इच्छा से चलता है। इसमें प्रेरक एवं मार्गदर्षक द्वारा कुछ भी थोपा नहीं जाता।
  • यहाँ आने वाले जिज्ञासु भौतिक, मानसिक, आध्यात्मिक, ईश्वर, प्रकृति, चैतन्यता, परमब्रह्म, प्रारब्ध व नये प्रारब्ध बनाने का महत्व समझकर खुषनुमा जीवन जीने लगते हैं।
  • यह मानव कल्याण की सरल पद्धति है जिसे हर आयु, जाति, धर्म, सम्प्रदाय, स्वस्थ या बीमार युवा या बुजुर्ग, हर व्यक्ति आसानी से कर सकता है। यह भौतिक व आध्यत्मिक दोनों जीवन जीने की कला है। इस पद्धति के द्वारा व्यक्तित्व व चरित्र का निर्माण किया जाता है।
  • अवगुणों को दूर कर गुणों का विकास कर व्यक्ति अलौकिक आनन्द, प्रेम, शांति और संतोष अनुभव करता है।
  • यह पद्धति अंधविश्वास पर आधारित नहीं है बल्कि आधुनिक विज्ञान पर आधारित है जिसे भौतिक आकर्षण के बीच भी हमारी बुद्धि, तर्क के आधार पर, सहजता से स्वीकार कर सकती है। भैयाजी स्वयं चले व एक पगडंडी बनाई इससे हमें विश्वास, साहस व चलने की प्रेरणा मिलती है व कई लोग अनुसरण कर इसे विस्तृत मार्ग बना रहे हैं। इस पर चलने वालों में अदभुत सकारात्मक परिवर्तन होता है।
  • इस मार्ग पर चलने के लिये एक प्रेरक एवं मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है, जो इस रास्ते पर चला हो और स्वयं अनुभव किया हो। इससे व्यक्ति को यह विश्वास रहता है कि वह सही मार्ग पर चल रहा है और उसकी प्रगति सतोषजनक हैं। भैया श्री नन्दकिषोर षारदा एवं माँ बसन्ती जी हमारे प्रेरक हैं व उनका दिया हुआ दिव्य ज्ञान एवं यह पद्धति हमारे लिये मार्गदर्षक हैं। मणिद्वीप में मधु माँ के मार्गदर्षन में अन्य सदस्य इस पर चल रहे हैं और अन्य लोगों ने भी अनुभव किया है इसलिये इस पर श्रद्धा एवं विष्वास बढ़ता जा रहा है।
  • यह बुद्धि-विवेक योग साधना, भैयाजी की ही साधनास्थली सिद्धपीठ व मणिद्वीप में सिखायी जाती है। जो भी व्यक्ति सुख एवं सफलता की खोज में है, वह बहुत ही कम समय में मूल सिद्धान्त सीख सकता है व अमरत्व की ओर बढ़ सकता है और साथ ही साथ, भौतिक जीवन में भी आराम से जी सकता है। इससे उसकी बुद्धि-विवेक दोनों निर्मल होंगे, शरीर स्वस्थ होगा मन एकाग्र होगा, आत्मविश्वास बढ़ेगा, चित्त शान्त और भय मुक्त होगा, नयी ऊर्जा का संचार होगा, जागरूकता का भाव उत्पन्न होगा और सकारात्मक सोच का विकास होगा।
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यह बुद्धि-विवेक योग साधना, भैयाजी की ही साधनास्थली सिद्धपीठ व मणिद्वीप में सिखायी जाती है। जो भी व्यक्ति सुख एवं सफलता की खोज में है, वह बहुत ही कम समय में मूल सिद्धान्त सीख सकता है व अमरत्व की ओर बढ़ सकता है और साथ ही साथ, भौतिक जीवन में भी आराम से जी सकता है। इससे उसकी बुद्धि-विवेक दोनों निर्मल होंगे, शरीर स्वस्थ होगा मन एकाग्र होगा, आत्मविश्वास बढ़ेगा, चित्त शान्त और भय मुक्त होगा, नयी ऊर्जा का संचार होगा, जागरूकता का भाव उत्पन्न होगा और सकारात्मक सोच का विकास होगा।

निष्कर्ष

वास्तव में 'बुद्धि-विवेक पर आधारित साधना योग एक मिशन है। यह एक सकारात्मक सोच व मानव जीवन को सफल करने का आज के युग में सरल व शीघ्र फल देने वाला मार्ग है। यह जीवन जीने की एक शैली है, जो हर व्यक्ति अपने रोजमर्रा की जिन्दगी में लागू कर सकता है व स्वयं को उन्नत कर सकता है। यह स्वयं माँ त्रिपुरसुन्दरी द्वारा दिये गये ज्ञान पर आधारित एक सरल मार्ग है। इससे व्यक्ति स्वयं तो उन्नत होगा ही, साथ ही वह अपने शरीर के अन्दर से उत्पन्न सकारात्मक तरंगों व ऊर्जा के कारण अपने सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों के जैसे परिवार, सहकर्मी, सहयोगी, पड़ौसी, इत्यादि के जीवन में भी ऊर्जा, उमंग व उत्साह का संचार करेगा जिससे उनका जीवन भी सुखमय होगा। यह पद्धति वास्तव में मानव जीवन की सफलता की कुंजी है। यह पद्धति चैतन्यता से परिपूर्ण है और यदि कोई व्यक्ति इसे श्रद्धा एवं जिज्ञासा द्वारा करेगा तो वह स्वयं चैतन्यता को अनुभव कर सकेगा। अर्थात् "बुद्धि-विवेक योग साधना से स्वयं व औरों को भौतिक उन्नति के साथ अमरत्व की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। समाज में इस सोच का प्रचार-प्रसार करना आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है ।